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परम्परा अबूझमाड़ की: शादी से पहले यहां साथ बिताते हैं रात

Penulis : Rakesh Malviya on Saturday, August 31, 2013 | 4:09 AM

Saturday, August 31, 2013


रायपुर। माड़िया लोगों मे शादी के पहले ही युवक— युवतियों को शारीरिक संबंध बनाने की छूट होती है । घोटुल मे बड़ी उम्र के युवक युवतियां छोटी उम्र के युवक—युवतियों को शारीरिक शिक्षा की सीख देते हैं । यहा पर विवाह की आपसी सहमति बन जाने पर युवक युवतियों को शादी करने के लिये बस परिवार वालों को बताना होता है । लेकिन राजी नहीं होने पर एक अजब रिवाज है। ऐसी स्थिति में अक्सर युवक या युवती जंगल भाग जाते हैं । लेकिन ऐसी शादी मे भी कीमत तो चुकानी ही पड़ती है । अबूझमाड़िया घोटुल मे लड़कियां रात मे नही सोती, लेकिन लड़के रात मे घोटुल मे ही रुकते हैं । लेकिन बाइसन हार्न माड़िया मे वे रात घोटुल मे ही बिताते है |


अबूझमाड़ के अनगढ़ जंगलॊं में एक ऐसी जनजाति निवास करती है जिसने आजतक अपनी मूल परंपरा और संस्कृति को सहेज कर रखा हुआ है । माड़िया जनजाति को मुख्यतः दो उपजातियों में बांटा गया है, अबुझ माड़िया और बाईसन होर्न माड़िया । अबुझ माड़िया अबुझमाड़ के पहाड़ी इलाको मे निवास करते है और बाईसन होर्न माड़िया इन्द्रावती नदी से लगे हुये मैदानी जंगलो में । बाईसन होर्न माड़िया को इस नाम से इसलिये पुकारा जाता है, क्योंकि वे घोटूल मे और खास अवसरों में नाचने के दौरान बाईसन यानी की गौर के सींगो का मुकुट पहनते हैं ।


माड़िया महिलायें अपने पति के साथ खाट पर नही सोती, और किसी उम्र से बड़े पुरुष के घर पर होने पर वह खाट पर नही बैठती हैं,ऐसा माना जाता है कि यह बड़े लोगों को सम्मान देने का एक सामान्य रिवाज है।


यदि किसी माड़िया युवक या युवती को बाघ उठाकर ले जाय तो वे उसे दैवीय प्रकोप समझते हैं । खासकर इसे पत्नी के अवैध संबंध से जोड़ा जाता है । यदि बाघ कम समय में उसी माड़िया के दूसरे जानवर को भी ले जाय तो वह अपनी पत्नी पर कड़ी नजर रखना शुरू कर देता है।


माड़िया समाज मे अनैतिक संबंधॊ को बिल्कुल बर्दाश्त नही किया जाता। लेकिन यदि महिला अपने पति से खुश ना हो तो वह बिना किसी विरोध के दूसरा पति चुन सकती है, बशर्ते वह व्यक्ति पहले को पत्नी के उपर खर्च की गयी विवाह की कीमत चुका दे ।



माड़िया जाति मे बहुविवाह की इजाजत भी है, लेकिन विवाह मे आने वाले भारी खर्च के कारण ऐसा यदा कदा ही होता है । इनमे विधवा विवाह की भी इजाजत है ।

दोनो उपजातियों की संस्कृति काफ़ी हद तक मिलती जुलती है । ये दोनों ही बाहरी लोगों से मिलना जुलना पसंद नहीं करते, लेकिन दोनो में अबूझमाड़िया ज्यादा आक्रमक हैं, वे बाहरी लोगों के अपने इलाके मे आने पर तीर कमान से हमला करना नही चूकते । जबकी बाईसन होर्न माड़िया बाहरी लोगो के आने पर ज्यादातर जंगलो मे भाग जाना पसंद करते हैं ।

माड़िया लोग बेहद खुशमिजाज शराब के शौकीन और मसमुटिया होते है । मसमुटिया छत्तीसगढ़ का स्थानीय शब्द है जिसका मतलब बच्चे की तरह जल्दी नाराज होना और फ़िर तुरंत उसे भूल जाना होता है । माड़िया काकसार नाम के कुल देवता की अराधना करते हैं । अच्छी फ़सल के लिये ये अपने देवता के सम्मान मे शानदार न्रुत्य करते है । संगीत और नाच मे इनकी भव्यता देखने लायक होती है।

ये बेहद कुशल शिकारी होते हैं और इनके पास गजब का साहस होता है । हमला होने पर यह बाघ जंगली भैसे या भालू से लोहा लेने में नही हिचकते । ये बाघ का बेहद सम्मान करते हैं और अनावश्यक कभी बाघ का शिकार नही करते । यदी कोई बाघ का शिकार करने के इरादे से इनके इलाके मे जाय तो माड़िया उसे जिंदा नही छोड़ते । माड़िया लोग वचन देने पर उसे निभाने के लिये तत्पर रहते हैं ।


माड़िया लोगों मे घोटुल परंपरा का पालन होता है जिसमे गांव के सभी कुंवारे लड़के लड़कियां शाम होने पर गांव के घॊटुल घर मे रहने जाते हैं । घॊटुल मे एक सिरदार होता है और एक कोटवार यह दोनों ही पद आम तौर पर बड़े कुवांरें लड़कों को दिया जाता है । सिरदार घॊटुल का प्रमुख होता है और कोटवार उसे वहां की व्यवस्था संभालने मे मदद करता है । सबसे पहले सारे लड़के घॊटुल मे प्रवेश करते हैं उसके बाद लड़कियां प्रवेश करती हैं ।

कोटवार सभी लड़कियों को अलग—अलग लड़कों में बांट देता है । कोई भी जोड़ा दो या तीन दिनों से उपर एक साथ नही रहता । इसके बाद लड़कियां लड़कों के बाल सवांरती हैं, और हाथों की मालिश करके उन्हे तरोताजा करती है । उसके बाद सभी घोटुल के बाहर नाचते हैं । नाच मे विवाहित औरतें हिस्सा नही ले सकती लेकिन विवाहित पुरूष ले सकते हैं । आम तौर पर वे वाद्य बजाते हैं । नाच मे हर लड़के एक हाथ एक लड़की के कंधे पर और दूसरी के कमर पर होता है । यह आग के चारॊं ओर घेरा बना कर नाचते हैं । नृत्य के समय के साथ तेज होता जाता है।

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मंदोदरी ने खोले रामायण से जुड़े वो राज जिन्हें सुनकर आप चौंक जाएंगे !


धारावाहिक रामायण ने जहां टीवी सीरियल के इतिहास में अमिट जगह बनाई, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि रामायण सीरियल बनने के दौरान इसके निर्माता रामानंद सागर ने एक्टरों से क्या-क्या पापड़ नहीं बिलवाये। रामायण में मंदोदरी का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री ने इस धारावाहिक से जुड़े ऐसे राज खोले हैं जिन्हें सुनकर आपका चौंकना स्वाभाविक है।
बहुचर्चित सीरियल रामायण में मंदोदरी की भूमिका निभाने वाली राजयोगिनी बीके प्रभा मिश्रा का कहना है कि इस सीरियल में मिले किरदार से उन्हें खासी पहचान मिली। मंदोदरी की भूमिका ने उनके जीवन को अध्यात्म का रास्ता दिखाया। राजयोग के जरिए वे ग्लैमरस लाइफ से दूर होकर पूरी तरह आध्यात्मिक बन गईं। 
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा शुभ विहार स्थित केंद्र में चल रहे 5 दिनी चिंतन शिविर में मुख्य वक्ता बनकर पहुंचीं बीके प्रभा मिश्रा ने कहा कि अभिनय के प्रति उनका रुझान बचपन से ही था। इप्टा ने उन्हें मंच दिया। 17 साल की उम्र से ही उन्होंने इस क्षेत्र में कॅरियर बनाना शुरू किया। इस बीच उन्होंने कई फिल्मों के अलावा टीवी सीरियल में कई किरदार निभाए। हिंदी फीचर फिल्म 'प्यार हुआ धीरे-धीरे' के साथ ही प्रतिबंध, आह आदि टीवी सीरियल की वे डायरेक्टर भी रहीं और इनमें किरदार भी निभाए। इसी बीच उन्हें रामानंद सागर के टीवी सीरियल रामायण में मंदोदरी के रोल का ऑफर मिला। इस किरदार ने उन्हें देश ही नहीं, विश्वभर में नाम दिया। इस सीरियल उन्हें खास पहचान मिली, तो दूसरी ओर उनके जीवन का रुख अध्यात्म की ओर मुड़ गया। 
बीके प्रभा ने रामायण से जुड़ा एक रहस्य साझा करते हुए बताया कि रामानंद सागर ने सीरियल शुरू करने से पहले ही सभी कलाकारों से सात्विक खान-पान, रहन-सहन का एग्रीमेंट किया था। 

सीरियल पूरे चार सालों में बना और कलाकारों को इस बीच नॉनवेज, स्मोकिंग, ड्रिंकिंग या अन्य दुव्र्यसनों से दूर रहना पड़ा

 जो एक्टर इनके आदी थे, उन्हें रामानंद सागर के इस नियम से खीज होती थी। चार साल बाद वही एक्टर पूरी तरह सात्विक बनकर निकले और आज भी उन्हीं नियमों पर चल रहे हैं। 

बीके प्रभा ने बताया कि रामायण के निर्माता-निर्देशक रामानंद सागर ने सीरियल को जीवंत बनाने के लिए मुख्य पात्रों के लिए जाति के अनुरूप किरदार तय किए थे। 

अरुण गोविल क्षत्रिय थे तो उन्हें राम बनाया गया। रावण ब्राह्मण कुल से थे, इसलिए इसके लिए अरविंद त्रिवेदी को चुना।

वे भी ब्राह्मण हैं, इसलिए उन्हें मंदोदरी का किरदार मिला। किरदार के लिए जाति का सामंजस्य इसलिए बिठाया गया कि किरदार उसमें पूरी तरह रम जाएं। ऐसा हुआ भी.

यही वजह है कि 18 साल बाद भी यह सीरियल दर्शक उतनी ही आस्था से देखते हैं। 

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